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मनसे को उत्तर भारतीयों से नफरत के बजाए, अपना नज़रिया बदलने की ज़रूरत है !

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मुंबई

‘हम लोगों को पीटते हैं, खुद मार खाकर नहीं आते, अगर कोई कार्यकर्ता अब मार खाकर आया तो पार्टी से निकाल दूंगा।’  ये है महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना चीफ राज ठाकरे का ताज़ा बयान, अपने तेज़ तर्रार स्वभाव और विवादित बयानों के लिए मशहूर राज ठाकरे ने एक बार फिर उत्तर भारतीयों के खिलाफ अभियान छेड़ रखा है। इस बार मनसे ने फेरीवालों की आड़ में उत्तर भारतीयों को खदेड़ने की प्लानिंग तैयार की है।

चुनाव में भले ही मनसे कोई कमाल न दिखा पाए लेकिन हर बार इसी तरह का विवाद करके अपने अस्तित्व का एहसास ज़रूर कराती रहती है। लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब महाराष्ट्र की राजनीति में मनसे कभी किंगमेकर की भूमिका में थी, लेकिन अब पार्टी राज्य की राजनीति के हा‌शिए पर है।

ऐसे अस्तित्व में आई मनसे

मौजूदा शिवसेना चीफ उद्धव ठाकरे के साथ मतभेद और चुनाव में टिकट वितरण जैसे प्रमुख फैसलों में दरकिनार किये जाने की वजह से 2005 में राज ठाकरे ने शिवसेना छोड़, 9 मार्च 2006 को अपनी पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बनाई। राज की पार्टी को आज 11 साल से भी ज़्यादा का वक़्त हो गया लेकिन अभी भी पार्टी का प्रदर्शन उस म्यान में नहीं खरा उतर पाया है, जिसके उम्मीद की गई थी।

जहां हिंदुत्व की राजनीति करने वाले बाल ठाकरे ने मुंबई और महाराष्ट्र के विकास के लिए एक अलग पैमाना बनाने के साथ-साथ एक कार्यशैली भी तैयार की, जिसका उन्हें फायदा भी उन्हें खूब मिला। वहीं, उनके भतीजे राज ठाकरे ने अपने चाचा के नक्शे कदम पर चलने का फैसला किया और गैर-मराठी मुद्दे पर फोकस किया। लेकिन इसका फायदा मनसे को चुनाव में नहीं हुआ, और राज ठाकरे जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने में नाकामयाब साबित हुए। हां, जब राज ठाकरे ने 2006 में पार्टी की शुरूआत की तो वे राज्य की राजनीति में बड़ी तेजी से आगे बढ़ने वाले नेता के तौर पर उभर कर सामने आए थे।

बालठाकरे राज के राजनीतिक गुरु थे, इसलिए उम्मीद की जा रही थी कि राज ठाकरे विपक्ष में पैदा हुए खालीपन को भरेंगे लेकिन वे ऐसा नहीं कर पाए। राज ठाकरे शिवसेना में टॉप लीडरों में से थे उन्हें बाल ठाकरे के उत्तराधिकारी के रूप में देखा गया था। लेकिन उनकी अलग पार्टी बनाने के फैसले ने इस अनुमान को गलत साबित कर दिया।

शक्ति प्रदर्शन

मनसे ने 2007 के चुनाव में शुरूआत की और 7 सीटें जीती। लोंगो मनसे से ज़्यादा उम्मीदें तो नहीं थी, यही वजह है कि कहा जाता था की पार्टी जल्द ही दम तोड़ देगी। लेकिन 2008 में पार्टी को नई ताकत मिली। राजठाकरे ने संसदीय और विधानसभा दोनों चुनावों में शिवसेना-बीजेपी वोट बैंक को दबाने के लिए उन्हें कड़ी टक्कर दी और बहुत बढ़िया प्रदर्शन किया था और यहीं वो दौर था जब करीब 200 कांग्रेस और एनसीपी कार्यकर्ता पार्टी छोड़ कर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना में शामिल हो गए।

2008 में उत्तर भारतीयों के खिलाफ महाराष्ट्र में हिंसा

मनसे के मराठी समर्थक और गैर मराठी के खिलाफ अजेंडे का समर्थन करते हुए फरवरी 2008 में राज ठाकरे ने कथित उत्तर भारतीयों के खिलाफ एक आंदोलन का नेतृत्व किया। शिवाजी पार्क की एक रैली में राज ने चेतावनी दी, अगर मुंबई और महाराष्ट्र में इन लोगों की दादागीरी जारी रही तो उन्हें महानगर छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया जाएगा। इस दौरान मनसे कार्यकर्ताओं ने महाराष्ट्र के विभिन्न हिस्सों में उत्तर भारतीय दूकानदारों और विक्रेताओं पर हमला किया।

फ़रवरी 2008 को पटना सिविल कोर्ट में ठाकरे के खिलाफ एक याचिका दायर की गई जो उनके बिहार और उत्तर प्रदेश के सबसे लोकप्रिय त्योहार छट पूजा पर टिप्पणी के विरोध में था। हालाकिं, इस पूरे मामले पर ठाकरे का कहना था कि वह छट पूजा के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ लोगों द्वारा इस अवसर पर “अहंकार प्रदर्शन” और “छट पूजा के राजनितिकरण” के खिलाफ हैं।

अक्टूबर 2008 में रेलवे बोर्ड एंट्रेंस एग्जाम देने मुंबई आए हिंदी भाषी उम्मीदवारों की पिटाई कर मनसे एक बार फिर सुर्खियों में आई। मनसे द्वारा कई स्टूडेंट्स की पिटाई की गई, और पूरे शहर में दंगे जैसा माहौल पैदा हो गया। भारतीय संसद में हंगामे के बाद और मनसे चीफ की गिरफ्तारी का दबाव नहीं होने के चर्चे के बावजूद, राज ठाकरे को अक्टूबर 21 के शुरुआती घंटों में गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें उसी दिन कोर्ट में पेश किया गया और रात जेल में बिताने के बाद वह अगले दिन वापस चले गए। हालांकि, राज ठाकरे की गिरफ्तारी के बाद मनसे कार्यकर्ताओं ने मुंबई शहर के कुछ हिस्सों और पूरे क्षेत्र पर गुस्सा निकाला।

मनसे का गिरता चुनावी प्रदर्शन

अपने शुरुआती दिनों में मनसे काफी मजबूती से आगे बढ़ी और 2009 के विधानसभा चुनाव में उसे 13 सीटों पर जीत मिली। हालांकि, साल 2009 के लोकसभा चुनाव में उसकी फजीहत हुई और उसे कोई खास सफलता नहीं मिली। साल 2012 के महाराष्ट्र निकाय चुनाव में उसे विधानसभा की तरह सफलता तो नहीं मिली, लेकिन फिर भी उसका प्रदर्शन ठीक-ठाक रहा।

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर मनसे को बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा और तो और 2014 के संसदीय और विधानसभा चुनावों में, मोदी लहर ने मनसे को सत्ता से दूर कर दिया और नतीजन मनसे के कई टॉप के लीडर जैसे प्रवीण दरेकर, राम कदम, रमेश पाटिल और वसंत गित ने पार्टी छोड़ बीजेपी का दामन थाम लिया। ये मनसे के लिए किसी झटके से काम नहीं था, लेकिन अभी तो बस शुरुआत थी क्योंकि उसी साल हुए विधानसभा में भी मनसे को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। जहां 2009 में उसे 13 सीट मिली थी, वहीं इस बार उसे मात्र 1 सीट मिली।

वही, अगर इस साल (2017) हुए बीएमसी चुनाव की बात करें तो मनसे ने 7 सीट हासिल तो कर ली लेकिन ये ख़ुशी भी महज़ चंद दिन ही बरकरार रही और ये पार्टी अपने 11 सालों के कार्यकाल में सबसे बदतर स्थिति में उस वक्त पहुंच गई जब बीएमसी में इसके 7 में से 6 पार्षद शिवसेना में शामिल हो गए। जहां, 227 सीटों वाले बीएमसी में अब शिवसेना पार्षदों की कुल संख्या 90 हो गई है, वही पार्षदों का साथ छोड़ जाने से मनसे के पास अब महज़ 1 पार्षद, कुर्ला से संजय टुर्डे रह गया है। वहीं विधानसभा में भी मनसे का केवल 1 विधायक जुन्नार से शरद सोनावने ही रह गया है।

लगातार गिरते प्रदर्शन से मनसे का भविष्य खतरे में दिख रहा है। अब देखना ये होगा कि राज ठाकरे मनसे को बचाने को और अपना राजनीतिक भविष्‍य तय करने के लिए कौन सी रणनीति और रास्ता अख्‍तियार करते हैं। हालांकि मनसे कार्यकर्ता और लीडर अभी भी पूरे आत्मविश्वास से कहते है कि मनसे वापस आएगी और प्रत्येक दल में उतार चढ़ाव आते हैं मनसे फिर से जोरदार वापसी करेगी।

ताज़ा विवाद

मनसे चीफ ने 5 अक्टूबर को मुंबई में एक बड़ी रैली का नेतृत्व करते हुए, विरोधियों को अपनी ताकत दिखाने की कोशिश की, ये रैली 29 सितंबर को हुए एल्फिंस्टन रोड हादसे के विरोध में आयोजित की गई थी। रैली में बड़ी तादाद में लोग शामिल हुए। इस दौरान राज ठाकरे ने अपने अंदाज में गरजते हुए चेतावनी भी दी कि यह पहला शांतिपूर्ण प्रदर्शन है, लेकिन अगला विरोध ऐसा नहीं होगा। इस दौरान राज ठाकरे ने मुंबई के सभी रेलवे स्टेशन के आसपास बैठे फेरीवालों को हटाए जाने अल्टीमेटम भी दिया और साथ ही ये भी कहा कि अगर रेलवे और सरकार ने ये कार्रवाई नहीं की तो मनसे उन्हें खदेड़ने का कदम उठाएगी।

कभी गैर मराठी ऑटोवालों की ऑटों जलाने का बयान देना तो कभी उत्तर भारतीय फेरीवालों की पिटाई और धमकाने का मामला हो, राज ठाकरे अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को कुछ भी करने की नसीहत के साथ साथ खुली छूट देते है। यही वजह है कि इन दिनों मुंबई समेत पूरे महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों के साथ पार्टी कार्यकर्ताओं द्वारा दुर्व्यवहार और मार पीट की वारदातों को अंजाम दिया जा रहा है। फिर चाहे वो सांगली में दौड़ा दौड़ा कर उत्तर भारतीयों को पीटना हो, या फिर ठाणे और नवी मुंबई में उत्तर भारतीय फेरीवालों से मार पीट करना हो, या मलाड में उत्तर भारतीय फेरीवालों के सामान फेककर उनके साथ दुर्व्यवहार करना, मनसे अपने मराठी प्रेम और गैर मराठियों के प्रति अपनी नफरत दिखाने का एक भी मौका नहीं चुकती है।

लेकिन कभी कभी मनसे को अपने ही ये वार भारी पड़ जाते है और अत्याचार सहने वाले लोग उसके ज़ुल्म के खिलाफ हथियार उठा लेते है। कुछ ऐसा हुआ जब मनसे के कार्यकर्ताओं को ‘मनसे स्टाइल’ में जवाब मिल गया।  दरअसल, उत्तर भारतीय और फेरीवालों के खिलाफ मनसे ने जो अभियान छेड़ रखा है, इसके तहत मनसे के कार्यकर्ता गुंडे मालाड और विक्रोली में दुकानों पर मराठी साइनबोर्ड न लगाने के मुद्दे को लेकर हुई झड़प में मनसे के चार कार्यकर्ता गंभीर रुप से घायल हुए। यहां लोगों ने मनसे के कार्यकर्ताओं को जमकर पीटा। अपने कार्यकर्ताओं की पिटाई से मनसे चीफ राज ठाकरे अंदर तक हिल गए और हुक्म सुना दिया कि मार खाकर नहीं आना, पीट कर आना।

मनसे कार्यकर्ताओं का मुंबई में हिंसा करना कोई नया नहीं है। पार्टी के लोग खुलकर बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों को निशाने बनाते रहे हैं। मनसे कार्यकर्ता उत्तर भारतीयों की दुकानों तक में तोड़फोड़ करते रहे हैं। ऐसे में कई दफा दूसरी तरफ से भी प्रतिक्रिया देखने को मिलती है और मनसे के लोग पीट दिए जाते हैं।

वैसे, अच्छा होगा की मनसे अब हिंसा को दरकिनार कर एक निष्पक्ष राजनीति के साथ अपने कदम आगे बढ़ाये क्योंकि जनता भी हिंसा नहीं, शांति चाहती हैं। ज़रूरत है मनसे को अपनी विचारधारा में परिवर्तन करने की और अब तो उसे भी अपने चुनावी प्रदर्शन के ग्राफ को देखकर इसमें परिवर्तन कर देना चाहिए लेकिन लगता है कुछ लोग अपनी गलतियों से भी नहीं सीखना चाहते।

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