“मेरे प्रभु! 
मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना 
ग़ैरों को गले न लगा सकूं 
इतनी रुखाई
कभी मत देना।” 
ग्वालियर में शिंदे की छावनी में 25 दिसंबर 1924 को पंडित कृष्ण बिहारी के घर में अटल नाम की मणि ने जन्म लिया। उस दिन ईसा मसीह का जन्मदिन भी था। जिससे गिरजाघरों में जश्न मनाया गया था। अंग्रेजी राज था तो ईसा मसीह के जन्म पर तोप के गोलों की सलामी दी गई थी। जो ऐसा आभास दे रही थीं, मानों नन्हें अटल के जन्म की खुशी में चलाई जा रही हों।
मगर कौन भविष्यवाणी कर सकता था कि कवि परिवार में जन्मा यह नन्हा तीन बार देश का प्रधानमंत्री बनकर यश अर्जित करेगा।
अटलजी और उनके पिता पंडित कृष्ण बिहारी ने क़ानून की पढ़ाई साथ में डीएवी कॉलेज से की थी।
लेकिन एक ही क्लास में पिता पुत्र का सेक्शन होने से दोनों कई बार हास्य के पात्र भी बने। यह समस्या सेक्शन बदलकर अटलजी ने सुलझा ली।
 1942 में गांधी जी के ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ आंदोलन में भाग लेने के कारण चौबीस दिन बच्चों की जेल में बंद कर दिया गया था।
‘पाण्चजन्य’ जैसे कई राष्ट्रवादी समाचार पत्रों के सम्पादक रहे।
“होकर स्वतंत्र मैंने कब चाहा है
कर लूं जग को ग़ुलाम।
मैंने तो सदा सिखाया है
करना अपने मन को ग़ुलाम।”
1957 को पहली बार लोकसभा चुनाव जीते। और फिर तो कविमना अटलजी राजनीति में अजातशत्रु बन गए।
भाषण शैली ऐसी जादुई कि विरोधी भी सम्मोहित होकर सुनते थे।
जनसंघ के संस्थापक सदस्य और भारतीय जनता पार्टी के पहले अध्यक्ष बने और पार्टी को राष्ट्रीय पहचान दिलाई।
“अंतिम यात्रा के अवसर पर
विदा की वेला में
जब सबका साथ छूटने लगता है
शरीर भी साथ नहीं देता
तब आत्मग्लानि से मुक्त
यदि कोई हाथ उठाकर
यह कह सकता है कि
उसने जीवन में जो किया
सही समझकर किया
किसी को जानबूझकर
चोट पहुंचाने के लिए नहीं
सहजकर्म समझकर किया
तो उसका अस्तित्व सार्थक है
उसका जीवन सफल है।”
अजातशत्रु पूर्व प्रधानमंत्री आदरणीय अटल बिहारी वाजपेयी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि। 
– भारत कविरत्न –

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