एक संन्यासी जिसने अपनी सारी संपत्ति दान कर दी। कहते हैं भजन सम्राट अनूप जलोटा। अनूप जलोटा के पीजे चैरिटेबल ट्रस्ट से जुड़े हैं। केपीजे ट्रस्ट की शुरुआत जाने माने संगीतकार खैय्याम और उनकी पत्नी जगजीत कौर ने, अपने एक मात्र पुत्र  प्रदीप की याद में। खैय्याम साब ने अपनी सारी संपत्ति, घर, पत्नी के जेवरात भी ट्रस्ट को देने की बात कही है। ताकि उनके बाद भी ट्रस्ट को पैसों की तंगी नहीं हो। पद्म भूषण से सम्मानित 93 साल के  खैय्याम विनम्रता से कहते हैं कि वह दान नहीं  कर रहे है ,वे देश को, इंडस्ट्री को वह लौटा रहे हैं जो इंडस्ट्री ने,देश ने उन्हें दिया। पेश है खैय्याम साब से खास मुलाकात के विशेष अंश। 

 

तो आप इस केपीजे चैरिटेबल ट्रस्ट के जरिए जो आर्थिक सहायता की जा रही है उसे आप दान नहीं मानते…
 
बिल्कुल … यह वही है जो हमें फिल्म इंडस्ट्री से मिला है ,जो  इस देश ने हमें दिया है।यह हमारा फ़र्ज़ बनता है। देश के हर नागरिक का फ़र्ज़ बनता है। पिछले तीन सालों से ट्रस्ट फिल्म्स वर्कर्स यूनियन को डेढ़ लाख रूपए का चेक दे रहा है। हमारे बाद सारी सम्पत्ति लिक्विफाइड हो जाएगी और ट्रस्ट को आर्थिक रूप से मदद मिलती रहेगी।फिल्म इंडस्ट्री के साथ साथ  आम ज़रूरत मंदों को मदद मिलती रहेगी।
 चीफ मिनस्टर रिलीफ़ फंड ओर प्राइम मिनिस्टर  रिलीफ़ फंड को भी फंड दिया जाता रहेगा।
आपके इस नज़रिए से आपका कंपोज़ किया गीत याद आ रहा है… तुम अपना रंज ओ गम अपनी परेशानी मुझे…
ये आपने बहुत बड़ी बात कह दी।हम इस काबिल नहीं है। अल्ल्लाह का करम , ईश्वर की कृपा , वाहेगुरु की मेहर है सब। वही करता है सब।
ज़हां तक नगमे की बात है …1964 की फिल्म है शगुन। साहिर साब ने लिखा था।और आपको शायद पता हो, इसे आवाज मेरे शरीके हयात जगजीत कौर की है। उनकी गायकी में आवाज़ में अनोखापन है। जो इस गीत ् को खूबसूरत लरज़ देती है। मुझे दिल तक पेश्त कर जाती हैं … ग़ौर फरमाइए….
 
तुम अपना रंजो गम अपनी परेशानी मुझे दे दो
तुम्हे उनकी कसम इस दिल की वीरानी मुझे दे दो ।
 
मैं देखूं तो सही दुनिया तुम्हे  कैसे सताती है 
कोई दिन के लिए अपनी निगेहबानी  मुझे दे दो ।
जगजीत जी ने और भी कई गीत गाए हैं। उमराव जान फिल्म की ओपनिंग जिस बिदाई गीत से होती है…
काहे को ब्याहे बिदेस… अमीर खुसरो की कलम से निकले इसे सुनकर आंसू आ जाते हैं।
उमराव जान के गीत संगीत को मील का पत्थर कहा जाता है कैसे की तैयारी…
दरअसल यह बहुत बड़ी चुनौती थी।कमाल अमरोही साब की पाकिज़ा का जादू छाया था। उमराव जान के गाने की कोई रिकॉर्ड  नहीं थी। जिसके जरिए आवाज़ के साथ साथ कैसे गाती थी पता चलता। हम दोनों ने रिसर्च शुरू कर दिया। पूरी किताब क इ दफा पढ़ डाली। उस दौर को ,उस। पेशे को समझने और अवध के फ्लेवर जान ने के लिए  उमराव के गांव पहुंच गए। उमराव एक साथ काई जिन्दगियां जी रही थी। बचपन में उसे बेच दिया गया ।न चते हुए उसने पेशा अपनाया लेकिन अपनी खूबसूरती,समझदारी,गीत संगीत की निपुणता और कमम्र में दुनिया दारी ने उमराव में वह कशिश पड़ा कर दी थी कि वह अपनी शर्तों पर नवाबों और राइजों को अपना मेहमान बनती।उमराव को अशर्फियां पेश की जाती थी अदब के साथ।उमराव के मयार को समझने के लिए हमने उस करेक्तर को जी लिया।फिर जो निखार के आया उसने उमराव के जादू को जिंदा कर दिया । आशा जी को उनकी रेगुलर आवाज और सुर से अलग गवाया।पहले वह तैयार नहीं हुई।लेकिन जब उन्होंने खुद अपनी आवाज़ सुनी तो हैरान रह गईं।फिल्म में सभी का योगदान होता है ।रेखा जी की खूब सूरती।अंदाज़।मुजफ्फर अली सब तो कअप्तान ही थे।शहरयार के गी। वाकई  मील का पत्थर बन गई  उमराव जा।
आवाज तो माशाअल्लाह आपकी भी अच्छी रही है।आप ने भी …
आवाज़ तो खैर ठीक ठाक हो गई थी। रियाज़ को की थी 5 साल।17 साल  था जब फिल्मों के नशे में अपने शहर जालंधर को छोड़ सीधे चचा जान के पास दिल्ली आ गया था जब उन्हें पता चल घर में बिना बताए दिल्ली आया हूं तो एक तमाचा जड़ दिया।अल्लाह का कर्म था दादी जान वहीं थीं।आंचल में दुबक गए।खैर उन्होंने अपने मित्र पंडित हुस्न लाल भगत राम,अमर नाथ जी के पास भेज दिया ।आज की तरह अकादमी वगैरह तो होते नहीं थे।गुरु – शिष्य परंपरा थी।वहां से मुंबई फिर लाहौर पहुंचा ।उस्ताद चिश्ती बाबा के पास पहुंचा ।वह रिहर्सल कर रहे थे।में अपने दोस्त के साथ ध्यान से सुन रहा था ।अचानक वह एक इंटर लयूड याद नहीं कर पा रहे थे।उन्होंने अपनी टीम से पूछा सब चुप।मैंने हिम्मत करते बता दिया।नाराज़ तो हुए बिना परमिशन के उनके कमरे में घुसने की वज़ह selakin खुश भी हुए और नौकरी मिल गया।बी आर चोपड़ा साहब ने तनखा 125 करवा दी।
 
फिर  पहुंचा बम्बई।अपने गुरु पंडित हुस्न लाल भगत राम के पास ।उन्होंने बच्चों को तरह गले लगाया।नरगिस की वालदा साहिबा जद्दन बीबी (मां) फिल्म बना रही थी रोमियो जूलिएट।इस फिल्म में मैंने ज़ोहरा अंबेवाली के साथ डू ए ट गया था।फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के बोल थे..दोनों जहां मोहब्बत में हार के,वो जा रहा है कोई….।संगीत गीत बहुत पसंद आया।
 
अब दूसरे उस्ताद चिश्ती बाबा ने वाली साहब और मुमताज शान्ति  से मिलवाया।फिल्म हीर रांझा । मेरे सिनिय र रहमान साब और मैं। सिट्यूएशन लड़कियों का भांगड़ा।गीत के बोल थे –  शहरों में से शहर सुना शhर सुना  सुल्तान… दूसरा गीत था – तेरा नाम है अकबरी सरबरी… इसे गीत  रॉय और मैंने गाय। अगली फिल्म  बीवी का रफ़ी साहब का गया गाना- अकेले में को घबराते तो होंगे, मिटा के मुझे पछताते तो होंगे।हमारी याद आ जाती तो होगी ,अचानक वो तड़पते तो होंगे। सुपर हिट हो गया।बड़े बड़े शायर काम करने तैयार थे।
साहिर के साथ आपकी अच्छी तरह जम रही थी…
 
साहिर सब के चलते मुझे राज कपूर साब का साथ मिला।रमेश सैगल फ्योदयोर द्योस्टकी की क्राइम एंड  पनिशमेंट पर फिल्म बना रहे थे ।हमेशा की तरह  राज कपूर की टीम के शंकर जय किशन  को मुसिक में लिए कंसीडर किया का रहा था ।साहिर ने मेरे नाम की शिफारिश करते हुए कहा music compose वहीं  kar सकता है जिसने क्राइम एंड पंशमेंट पढ़ी हो और उसे समझ सकता हो।मैंने पढ़ा था ।खैर राज साहब न धुन बना ने कहा।हमने सुनाई राज साहब एक दम ब्लैंक।।एक के बाद एक 5 धुन सुनाई ।राज साहब ब्लैंक । सैगल के साथ दूसरे कमरे में गए 40 मिनट तक कोई रिएक्शन नहीं।हमें लगा।कुछ नहीं होगा ।अचानक सैगल आए और माथा चूमने लगे।राज साहब ने कहा ।’  खान छुपे बैठे थे यार…पाचो धुन की रिकार्डिंग हुए।फिल्म थी hi- फिर सुबह होगी। खय्याम हिट।
ये आपके नाम का क्या मांजरा था।आपका नाम खय्याम…
 
दरअसल मेरा असली नाम यानी पूरा नाम है मोहम्मद जहूर खय्याम हाशमी।दिया सरहदी साहब एक बड़े रायटर, डायरेक्टर और शायर भी थे।उन्होंने मेरा नाम पूछा मैंने बता दिया ।दिया साब ने कहा।खय्याम के आगे पीछे साब भूल जाओ।सिर्फ खय्याम। मैं खय्याम बन गया। एक बात बताता हों गुरु जी पंडित जी  के कहने पर मैं और रहमान साब शर्मा जी वर्मा जी के नाम से संगीत देते रहे।
आपको ज्यादा स्ट्रगल नहीं करना पड़ा था।जैसे फुटपाथ पर सोना ।हताश होकर लौट जाने की बात सोचना…
 
इस मामले में मैं खुश किस्मत रहा। उस्तादों की गुरुओं की मेहरबानी बनी रही। फुटपाथ पर तो नहीं सोया पर फिल्म फुटपाथ ने मेरी किस्मत बदल दी। रंजीत मूवीटोन के मालिक थे सरदार चंदू लाल शाह।1953 में जिया सरहदी के डायरेक्शन में बनी ।दिल्ली कुमार मीना कुमारी। तलत  महमूद की मखमली आवाज़ ।
शाम-ए-ग़म की क़सम आज ग़मगीं हैं हम

आ भी जा आ भी जा आज मेरे सनम
शाम-ए-ग़म की क़सम
दिल परेशान हैं रात वीरान हैं
देख जा किस तरह आज तनहा हैं हम
शाम-ए-ग़म की क़सम

चैन कैसा जो पहलू में तू ही नहीं
मार डाले न दर्द-ए-जुदाई कहीं
रुत हंसीं हैं तो क्या चाँदनी है तो क्या
चाँदनी ज़ुल्म है और जुदाई सितम
शाम-ए-ग़म की क़सम

हलांकि आपने अपने लंबे करियर मे चुनिंदा फिल्में की हैं। फ़िर भी फेहरिस्त बड़ी लम्बी है गीतों की। जोआज भी खुशनुमा झोंके की तरह फिजा को लबरेज़ कर देते हैं। आप के पसंदीदा …

बेशक उमराव जान। रज़िया सुल्तान भी मेरे दिल के करीब है।लता जी का गाया – ऐ दिया एक नादान…. लताजी का कहना था कि यह गाना उनके दिलों दिमाग़ पर लंबे अरसे तक गूंजता रहा।

राज कपूर साहब के साथ मैं ने एक ही फिल्म की। जागते रहो। मेरे दिल के करीब है यह फिल्म भी।

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