वो लोरी मुझे माँ की याद आ रही है 
हवा ठंडी ठंडी , घटा छा रही है….. 
 
भावनाओं में लिपटी , सूफियाना अंदाज़ की शायरी का अपना लुत्फ़ होता है। ऐसे शायर आज कम हो चले हैं किन्तु जितने भी हैं उन्होंने मानवीय संवेदनाओं, भावनाओं और उसके ममत्व को शब्दों में कुछ इस तरह उतारा है कि उनके शब्द सीधे दिल को छूते हैं। मस्तिष्क को झंकृत कर देते हैं। जनाब आशीष ‘अश्क’ आज के दौर के ऐसे ही एक शायर हैं, ग़ज़लकार हैं जिनकी ग़ज़लों में न केवल भावनाएं हैं,बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा भी है,वे व्यवस्था पर भी चोट करते हैं और मानवीय संवेदनाओं, उसकी पीड़ा को भी अपनी ग़ज़लों में कहते हुए सीधे दिल में उतर जाते हैं।आशीष ‘अश्क’ का पहला ग़ज़ल संग्रह ‘सैलाब’ का विमोचन पिछले दिनों मध्यप्रदेश के उज्जैन शहर में हुआ। ‘सैलाब’ में कुल ८३ गज़लें हैं।  अमूमन देखने में आया है कि किसी भी ग़ज़ल संग्रह में १०० या १०१ जैसे अंको में गजलें होती हैं। सैलाब में ८३ ग़ज़ल ही क्यों शामिल की गयी ? जनाव आशीष ‘अश्क’ कहते हैं, ‘पिता ८३ वर्ष की उम्र तक हमारे मध्य सदेह रहे। उनके जन्मदिन पर, उन्हें समर्पित किया गया है ये संग्रह, लिहाजा ८३ गज़लें ही इसमें शामिल है। ‘ माता-पिता को समर्पित गजलों में माता-पिता के प्रति प्रेम किसी झरने की तरह झरता है। तभी तो उन्होंने ८३ वीं गजल माँ के लिए लिखी है कि – ‘वो लोरी मुझे माँ की याद आ रही है, हवा ठंडी ठंडी , घटा छा रही है। नहीं है उसे फ़िक्र अपनी तो कुछ भी , वो बच्चों की खातिर जिए जा रही है।‘ 
 
आशीष ‘अश्क’ के ग़ज़ल संग्रह ‘सैलाब’ की यही खूबी है जिसमें इश्क भी है , दर्द भी और दवा भी है। आमतौर पर ग़ज़लों में इश्क अधिक होता है , सैलाब में भी है किन्तु अधिकतर गजलें खुदा की इबादत और अध्यात्म के गहरे सरोवर में जैसे मोती पाना  है, और इसी प्रकार की ग़ज़लों से ‘अश्क’ साहब पाठको को गहरे डुबो देते हैं।  वे कहते हैं – वो हर जगह है पर कहीं कोई पता नहीं , मौजूद है वो मुझमें भी लेकिन मिला नहीं। ‘ 
 
उनकी एक गजल में वैराग्य झलकता है -‘ इस जहां में बाँट दूंगा मैं यहां जो पाउँगा , तब कहीं मुमकिन है अपने मन को मैं धो पाऊंगा। ‘ ‘सैलाब’ एक ऐसा संग्रह है जो आज के सच को उजागर करता हुआ अपनी बात कहता है कि- ‘ क़द जो दुन्या में किसी का जब ज़रा ऊंचा हुआ , फिर नज़र में धुंदला उसके हर कोई रिश्ता हुआ। ‘ ये कितना बड़ा सच है आज के आदमी का। आदमी के  संघर्ष, आदमी की परेशानियों, आदमी की  मुसीबतों को उन्होंने कुछ इस तरह पेश करते हुए कहा है कि – ‘ जीते जी हमसे कहाँ दूर मुसीबत होगी , ये तो जब होगा क़ज़ा तेरी इनायत होगी। ‘   
 
‘सैलाब’ की गजलों में सौंधापन है , मीर , ग़ालिब, जोक जैसे शायरों के रस्ते कदम होते हुए यदि ये कहा जाए कि आशीष ‘अश्क’ की गजलें भी कमोबेश हमें उसी दुन्या में ले जाती है , ग़ज़लों के उसी सुहाने, रुहाने आलम का अहसास दिलाती हैं तो गलत नहीं होगा।  शायद यही वजह है कि ‘सैलाब’ के लिए हिन्दुस्थान के प्रख्यात आलोचक साहित्यकार विजय बहादुर सिंह ने अगवानी की और लिखी भी है।
डॉ.असद निज़ामी ने इसमें तक़्ररीज़ की है। और उस्ताद शायर समीर कबीर साहब ने दुआइय: लिखकर ग़ज़लों को अपने आशीर्वाद दिए हैं। संग्रह की विशेषता ये है कि इसमें जनाब आशीष ‘अश्क’ के साहित्यकार पिता डॉ. जे.पी. श्रीवास्तव द्वारा लिखी गयी वो हस्तलिखित समीक्षा भी है जो अधूरी रह गयी थी , जिसे वे पूरा नहीं कर पाए और उनका स्वर्गवास हो गया। कुलमिलाकर ‘सैलाब’ के प्रकाशन से ये तय हो जाता है कि असल ग़ज़लें और उसे लिखने वाले शायर आज भी मौजूद हैं जिन्हे पढ़कर ग़ज़लों के आनंद में डूबा और तैरा  जा सकता है।

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