मुंबई : ​महाराष्ट्र राजनीति के चूल्हे पर भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना का ही तवा गर्म रहता है। उस पर यदि कभी राष्ट्रवादी या कांग्रेस बैठने की कोशिश करते हैं तो झनझना उठते हैं। हालांकि कांग्रेस इन दिनों पूरा जोर लगा रही है कि महाराष्ट्र राजनीति में वो अपनी दाल गला सके मगर फिलवक्त ये दूर की कौड़ी नजर आता है। इसके कारण हैं। कारण यह है कि जबसे शिवसेना और भाजपा अखाड़े के दो पहलवान बने और आपस में गुत्मगुत्था हुए तब से उनकी जंग के बीच उठी धूल के बवंडर में अन्य पार्टियां आँखे मलती  ही रह जा रही है। ऐसे में राजनीतिक गलियारे में चर्चाएं आम हो जाती है कि क्या सचमुच दोनों दल अलग अलग हैं या दोनों के ये राजनीतिक दांव-पेंच हैं जो अन्य दलों के लिए घोड़ा पछाड़ का काम कर रहा है ? दरअसल केंद्र-राज्य और मुम्बई मनपा में ही दोनों की सरकारें हैं। दोनों दोस्त हैं, मगर दोनों दुश्मनो की तरह बाहर भिड़े हुए हैं।
कांग्रेस ने तो कई बार उनके इस दांव पेंच को जनता के समक्ष रखने की कोशिश की किन्तु वो ढंग से नहीं रख पाई और मुंह की खानी पडी। एनसीपी कांग्रेस से अधिक दिमागी जंग में विश्वास  रख रही है।  उसको इससे फायदा भी पहुँच रहा है और ये फायदा देखकर ही भाजपा और शिवसेना दोनों परेशान भी है। किन्तु अपनी इस परेशानी को दोनों ही आपस में एकदूसरे को पटखनी देने वाले तथाकथित नाटक में जाहिर नहीं होने देना चाहते।
पालघर उपचुनाव में शिवसेना की भाजपा से हार तिलमिलाहट का कारण है।  वैसे कई सारे कारण हैं जिससे शिवसेना की तिलमिलाहट सातवें आसमान पर हैं।  किन्तु  भाजपा के साथ गठबंधन बनाए  रखने  के लिए उसके समक्ष कई मजबूरियाँ भी हैं। भाजपा शिवसेना से आगे निकल चुकी है।  ये उसके लिए खुशी की बात हो सकती है , मगर है नहीं क्योंकि उसे हमेशा ये भय सताता है कि यदि शिवसेना का गुस्सा विधानसभा के पटल पर हकीकत में उत्तर  आया और सरकार से वो अलग हो गयी तो उसके लिए ये संकट का सबब बन सकता है। इसके लिए हालांकि एनसीपी के सामने भी उसने दाने फेंके थे किन्तु उसका लाभ नहीं हुआ।
एक समय तो लगा था कि एनसीपी और भाजपा साथ आ जाएंगे मगर ये सिर्फ राजनीतिक सुर्खियां बनकर दफन हो गया।  आज की स्थितियां ऐसे किसी नए  गठबंधन से इंकार करती है।  यानी महाराष्ट्र शिवसेना और भाजपा के दंगल में ही डूबा हुआ है। और तो और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का शिवसेना कार्याध्यक्ष उद्धव ठाकरे से मिलने पहुंचना राजनीति के नए समीकरणों की और संकेत देने लगे हैं , हालांकि उद्धव  ठाकरे ने स्पष्ट कहा है ये सब ड्रामा है। किन्तु क्या सचमुच ड्रामा है ?
एक तरफ जब शिवसेना पालघर उपचुनाव की हार से कसमसा उठी तब दूसरी तरफ मुंबई में शिवसेना कार्याध्यक्ष उद्धव ठाकरे और भाजपा के राष्ट्रीय  अध्यक्ष  अमित शाह के बीच की बैठक कई सवाल महाराष्ट्र  राजनीति की फ्रेम में जड़ती है।इस मुलाक़ात के पूर्व एक जबरदस्त माहौल भी बनाया गया था।  दरअसल इस माहौल ने उपचुनावों में कांग्रेस और एनसीपी को भी मिली अभूतपूर्व सफलता के जश्न को लगभग खत्म कर दिया था। बताया गया कि भाजपा से नाराज चल रहे गठबंधन सहयोगी शिवसेना द्वारा पालघर संसदीय उपचुनाव में अलग प्रत्याशी उतारे जाने की पृष्ठभूमि में शाह और ठाकरे की यह भेंट थी। मगर जब बैठक हुई इसके बाद इस मुद्दे को ज्यादा हवा नहीं दी गयी और एक बेहतर माहौल के बीच बैठक संपन्न हुई जैसी ख़बरें बाहर आई। मगर सबकुछ बेहतर हुआ ऐसा भी नहीं था। अमित शाह और उद्धव ठाकरे की मुलाकात के पूर्व माना जा रहा था कि भगवा पार्टी का यह कदम अपनी नाराज सहयोगी तक पहुंचने का एक प्रयास है, जो खुलकर उसके वरिष्ठ नेताओं की आलोचना करती है।
भाजपा को कभी अपने सिर नहीं चढ़ने देने की जद्दोजहद के बीच  शिवसेना सांसद संजय राउत ने चार साल के अंतराल के बाद ठाकरे से मुलाकात की आवश्यकता पर सवाल उठाया। हालांकि, भाजपा के वरिष्ठ नेता सुधीर मुनगंतीवार ने कहा कि ठाकरे के साथ शाह की यह मुलाकात पार्टी की देशव्यापी ‘समर्थन के लिए संपर्क’ अभियान के तहत हो रही है। इसका महाराष्ट्र में पालघर एवं भंडारा-गोंदिया लोकसभा सीटों पर हाल में हुए उपचुनाव से कोई लेना देना नहीं है। जबकि राउत ने कहा, ‘‘ पालघर उपचुनाव को हमने अकेले लड़ा और हमने दिखाया कि हम अकेले भी चुनाव लड़ सकते हैं।  हालांकि हम हार गये लेकिन यह संदेश सबको गया।  हमें चुनाव में (पालघर उपचुनाव में) लाखों वोट मिले, जहां हमने कभी अकेले कोई चुनाव नहीं लड़ा था।’’  राउत ने कहा कि राजग के सहयोगी एक-एक कर भाजपा को छोड़ रहे हैं। भाजपा के खिलाफ (लोगों में) नाराजगी है इसलिए अब पार्टी ने सुलह के उपाय करने शुरू कर दिये हैं। यह पूछे जाने पर कि क्या आगामी सभी चुनावों में शिवसेना यही रुख जारी रखेगी, इस पर राउत ने कहा कि पार्टी प्रमुख ठाकरे ने गहन विचार करने के बाद यह तय किया कि हम कोई गठबंधन नहीं करेंगे।
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राज्यसभा सदस्य राउत ने कहा कि ‘‘ यह फैसला लोगों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए किया गया। मैं नहीं समझता कि इस रुख में कोई बदलाव होगा।’’ जबकि दूसरी ओर मुनगंतीवार अपनी रट लगाए हुए थे कि शाह भाजपा की देशव्यापी संपर्क कार्यक्रम के तहत ठाकरे एवं अन्य लोगों से मिलने वाले हैं। उन्होंने कहा, ‘‘ भाजपा की ‘समर्थन के लिए संपर्क’ अभियान के तहत अमित शाह जी देशभर में यात्रा कर रहे हैं। उद्धव जी से उनकी यह मुलाकात इसी कार्यक्रम का हिस्सा है। शिवसेना ने हमेशा भाजपा को एक तरह से दुत्कारा है। संजय राउत ने अपने एक लेख के जरिये भी पार्टी के विचार पटल पर रखे थे कि ‘‘ शिवसेना भाजपा की सबसे बड़ी राजनीतिक शत्रु है।  शिवसेना का प्रखर हिन्दुत्ववाद भाजपा के लिए अड़चन पैदा कर सकता है।  मजा ये रहा कि  भाजपा और शिवसेना की इस बयानबाजियों के बीच अमित शाह और उद्धव ठाकरे की मुलाक़ात सुपरहिट मानी गयी।  कांग्रेस और एनसीपी बस देखते ही रह गए। उनके विरोध की आवाज नक्कार खाने में तूती की आवाज बनकर रह गयी।
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मुलाकत हुई। कयास लगने लगे कि  संभव है अब कुछ अच्छा सन्देश बाहर आएगा।  भाजपा की ओर से कहा गया ये एक बेहतर मुलाक़ात थी तो शिवसेना की ओर से भी सब मुस्कुराते हुए नज़र आए मगर मजा तो ये रहा कि  शिवसेना ने एकबार फिर ऐलान कर दिया है कि वह 2019 का आमचुनाव अकेले अपने दम पर लड़ेगी। भाजपा के कान में झींगुर की आवाज लगातार बज रही है।  उसे महाराष्ट्र में शिवसेना चैन से नहीं बैठने दे रही ये निर्विवाद रूप से सच है। उद्धव ठाकरे और अमित शाह की मुलाकात के बाद शिवसेना सांसद संजय राउत ने कहा कि हम अमित शाह का एजेंडा जानते हैं। लेकिन हम कह देना चाहते हैं कि शिव सेना ने प्रस्ताव पारित किया है और हम चुनाव अपने दम पर ही लड़ेगे। उन्होंने कहा कि प्रस्ताव में किसी भी तरह का बदलाव नहीं किया जाएगा।  संजय राउत की बात से ये तो निश्चित ही प्रतीत हो रहा है कि मुलाक़ात का असर कम से कम अभी महाराष्ट्र को दोनों की राजनीति का स्पष्ट रूप नहीं दिखाएगा।
वैसे तो भाजपा-शिवसेना के बीच गिले शिकवे दूर करने के लिए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे के साथ मातोश्री में जाकर मुलाकात की थी।  दोनों नेताओं के बीच बंद कमरे में करीब सवा दो घंटे से अधिक चर्चा हुई जिसमें मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और युवा सेना अध्यक्ष आदित्य ठाकरे भी मौजूद थे। दोनों नेताओं की मुलाकात के बाद माना ये जा रहा था कि उद्धव के रुख में नरमी आई है लेकिन दूसरे ही दिन शिवसेना ने चुनाव को लेकर अपना रुख साफ कर दिया। और कहा है कि वह आगामी सभी चुनाव अपने दम पर लड़ेगी। जबकि अमित शाह ने पूरा प्रयास किया था कि बात बन जाए। खुद अमित शाह ने मुलाकात के बाद कहा था कि शिवसेना सभी गिले-शिकवे भुला कर आगामी चुनाव भाजपा के साथ में लडे़ंगे। उन्होंने भरोसा दिलाया था कि राजग में शिवसेना को पूरा सम्मान दिया जाएगा। भाजपा अध्यक्ष ने बताया था कि शिवसेना की शिकायतों के मुद्दे पर वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से चर्चा कर उसका निवारण करेंगे। मगर अभी शाह ढंग से दिल्ली पहुँच पाते उसके पहले ही शिवसेना ने अपने तेवर स्पष्ट कर दिए। यानी अब ये तो लगभग स्पष्ट हो ही चुका है कि दोनों के बीच हाथ तो मिलाया गया है मगर दोनों गले नहीं मिले हैं।
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महाराष्ट्र के अगले चुनावों में ये भी तय होगा कि दोनों अलग अलग चुनाव ही लड़ेंगे औ​​र उसमे दोनों को ही अपनी अपनी हानियाँ झेलनी भी होगी।  दरअसल इधर कांग्रेस और एनसीपी साथ में होकर समर में कूदना चाहती है।  उपचुनाव के परिणाम भी उन्हें आक्सीजन देते नज़र आए हैं , ऐसे में उनकी सोच यही होगी कि शिवसेना-भाजपा की लड़ाई में बाजी वो मार ले जाए।  ऐसा सम्भव भी हो सकता है क्योंकि राज्य में अब ऐसी मानसिकता भंग हो चुकी दिखती है जिसमे भाजपा और शिवसेना के हक़ में लोग अपना सबकुछ भूल जाएं।  शिवसेना के अहम् की लड़ाई में वो अपने पैरों पर कुहाड़ी चलाती नजर आती है तो भाजपा अपनी हेकड़ी में झुकने को तैयार नहीं है।
कांग्रेस और एनसीपी तो वटवृक्ष की जड़ों की तरह आपस में गूँथी रहकर चोट पहुंचाने की फिराक में है किन्तु सबसे बड़ी कमजोरी बस उनके नेतृत्व को लेकर है।  जो अभी तक स्थापित नहीं हो पाया है।  राहुल गांधी के नाम पर कांग्रेस को वोट नहीं मिलने वाले मगर शरद पवार के नाम पर एनसीपी को वोट जरूर मिलेंगे। ऐसे में कांग्रेस अधिक कमजोर दिख रही है , उस पर संजय निरुपम जैसे नेताओं की वजह से उसे विवादों के घेरे में भी खड़ा होना पड़ रहा है। विपक्ष की इसी कमजोरी का फ़ायद शिवसेना और भाजपा उठा सकती है मगर तभी जब वो साथ में रहकर चुनाव में उतरे किन्तु ऐसा अब संभव नहीं दिख रहा तो ये भी मानने को तैयार रहना चाहिए कि महाराष्ट्र की राजनीति का ऊँट करवट बदल भी सकता है।

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