[ सुशीला तिवारी ] 
जगदंबा प्रसाद दीक्षित की पुण्यतिथि पर विशेष  –
“मैं अपनी बात करूं तो यह साफ है कि बहुत शुरू से ही गरीबी, विषमता, अन्याय,शोषण वगैरह ने मेरी मानसिकता को प्रभावित किया था यह प्रभाव वैचारिक ही नहीं था, भावनात्मक भी था। मैं अपने आप को इन लोगों में से एक पाता था। इस करुणा से ही वैचारिकता का जन्म हुआ।पीड़ित व्यक्तियों की मुक्ति के संबंध में जो विचार पैदा हुए उन्होंने मुझे मार्क्सवाद के करीब ला दिया।” अनुष्का पत्रिका में जगदंबा प्रसाद दीक्षित ने स्वयं अपनी मार्क्सवादी विचारधारा के बारे में लिखा है।
दीक्षित जी मार्क्सवादी विचारधारा के कट्टर समर्थक रहे।उन्होंने समाज के कष्टमय जीवन को परोक्ष रूप से देखा था, जो उनके मन में करुणा का उद्रेक करता था। उन्होंने जो देखा,भोगा,समझा, महसूस किया उसे बिना लाग-लपेट के लिख दिया, उनको इस बात की कोई फ़िक्र नहीं थी कि उन्हें  इससे कोई नुकसान होगा।फ़ायदे की बात ही दूर। कौन क्या सोचता है,किस तरह की प्रतिक्रिया होगी… साहित्यिक जगत में उनका रुतबा कैसे बनेगा… इन पाखंड से अलग वह उनके उस लेखन के प्रति समर्पित थे जो समाज को आईना दिखाने की कूवत रखता था।
हिंदी कथा साहित्य में पहली बार सर्वहारा की उपस्थिति पूरी धमक के साथ दर्ज कराई दीक्षित जी ने। महानगरों का आधुनिक समाज कई वर्गों में विभक्त है उनका ढांचा पुरातन समाज से पूरी तरह भिन्न है। आज के समाज में वर्ग आधुनिक सभ्यता के स्थापित होने के बाद ही अस्तित्व में आए। यह वर्ग व्यक्ति की आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं। छोटे-छोटे गांव, कस्बों से निकलकर विशाल जनसमूह नगरों, महानगरों में ही जीविका का आधार पाते हैं।
जीविकोपार्जन के अलग-अलग मार्ग के कारण यह विभिन्न वर्गों में बढ़ जाते हैं| महानगर में इन्हें अनेक तरह की विभीषिकाओं का सामना करना पड़ता है।
दीक्षित जी इन्हीं वर्गों की संघर्ष गाथा अपने उपन्यास और कहानी में व्यक्त करते हैं। ‘मुर्दा-घर’ उपन्यास में चित्रित वेश्याओं, भिखारियों, स्मगलर, पुलिस स्टेशन का घृणित रूप, कचरे में कुत्तों के बीच खाना झपटते लाचार बच्चे, पाइप लाइन में बच्चे पैदा करने को मजबूर लोगों की बेबसी की गाथा है। दीक्षित जी ने इस उपन्यास को प्रमाणिक बनाने के लिए इसमें विश्वसनीय घटनाओं और जीवन प्रसंगों की उप स्थापना की है। उपन्यास के छोटे बड़े सभी पात्र वैसे परिवेश की प्रस्तुति में सहायक है, जो उनके जीवन संघर्ष के साथ-साथ भारतीय यथार्थ के चित्रण में भी मददगार साबित होता है।
मुर्दा-घर उपन्यास का एक अंश जो परिवेश की प्रस्तुति का बड़ा ही यथार्थ पूर्ण चित्रण किया है- 
वहां अंधेरे में बैठा हुआ है आदमी… नंगा… हजारों साल हो गए.. इसी तरह। धो रहा है एक गंदा कपड़ा… साफ नहीं होता| छप- छप…. दूर तक जाकर खत्म हो जाती है आवाज। वहां और कोई नहीं। एक तरफ सागर…. दूसरी तरफ आसमान….. दूर टिमटिमाती हुई बत्तियाँ| फिर वही छप- छप- छप…
दीक्षित जी ने महानगर की चमक दमक, विलासिता, ऐश्वर्य के पिछवाड़े में फैली हुई वीभत्सता और उसमें घिरे हुए सबसे निचले स्तर पर जीते मनुष्य के क्लेश को देखा जिसे हम देख कर भी अनदेखा किए रहते हैं।
दीक्षित जी का दूसरा उपन्यास ‘कटा हुआ आसमान’ है। इस उपन्यास में वर्गों के द्वंद की अभिव्यक्ति है। उच्च वर्गीय और निम्नवर्गीय लोगों के बीच मध्यम वर्गीय लोग लगातार पिसते चले जाते हैं। महानगर में आने के बाद व्यक्ति के विचार जीवन दृष्टि में परिवर्तन हो जाता है। इनका आचरण कृत्रिम हो जाता है, बदले में केवल अकेलापन, संत्रास व भटकन ही हाथ लगती है। परिणाम स्वरुप यह मनुष्य अनेक अंतर्विरोधों का पुंज बनकर रह जाता है।
इतिवृत्त उपन्यास में इन्होंने ग्रामीण परिवेश की अनेक समस्याओं का चित्रण किया है। उपन्यास के प्रारंभ से ही गांव में यातायात की समस्या व्यक्त हुई है। दीक्षित जी इस उपन्यास में एक ऐसी सच्चाई से रूबरू करवाते हैं, जो आज के गावों का यथार्थ है। इस उपन्यास में कुछ सामान्य भारतीय जीवन शैली को प्रस्तुत किया गया है, जहां व्यक्ति रोजगार की तलाश में महानगर की ओर जाता है, परंतु गांव में माता पिता की तबीयत खराब होने पर वहां जाकर अनेकों रीति-रिवाजों में आते हुए बंधना और फिर उसे तुरंत ही पूरा कर पुनः अपने रोजमर्रा के जीवन में खपना पड़ता है।
आदत से मजबूर है। रात रात की ड्यूटी थका देती है। जीवन में कोई है नहीं| ना पिए तो कहां जाए।एक बार जो शुरू होता है…. तो चलता जाता है। जब तक गिर ना जाए… पीते जाते हैं, सब कुछ भूल जाते हैं। अपनी रोटी रोजी… मायके में पड़ी औरत और बच्ची…. आगे की जिंदगी… पीछे की जिंदगी। …. अब खटते हैं कारखाने में, पेट भर लेते हैं… मगर जिंदगी में कोई फर्क नहीं पड़ता। रोज कुआं खोदों… और रोज पानी पियो… कितने साल चलेगा यह सब।इस उपन्यास का मुख्य पात्र इस प्रकार के वृत्त में घूमता,टूटता,बिखरता है और फिर मशीनों की भांति जिंदगी से जुड़ने का कार्य भी करता है।
अकाल उपन्यास में दीक्षित जी ने सूखे (अकाल) के साथ-साथ जीवन के अकाल का मार्मिक रूप से चित्रण किया है। इस उपन्यास में समाज और व्यक्ति के रिसते रिश्तो का मार्मिक पुट दिया है। आज का भारतीय गांव शुद्ध अर्थों में गांव नहीं रहा है। आज वह महानगरों की आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विकृति की छाया में पल रहा है।  गांव के जीवन में हर जगह महानगरों के अपसंस्कृति और विकृत मूल्यवत्ता फैली है।
इस उपन्यास में उस मर्म का चित्रण किया गया है। इस उपन्यास का पात्र जगदीश ग्रामीण जीवन की सादगी छोड़कर शहर की ओर आकर्षित हो रहा है। जो उपन्यास के इस अंश से स्पष्ट होता है – “जगदीश के लिए शहर की संस्कृति श्रेष्ठ है। जब से मुंबई गए थे… गांव ही उनको फालतू लगने लगा था। भैया किसी ऊंचाई पर पहुंच गए थे। गांव के हम सब लोग बहुत छोटे हो गए हैं। “
दीक्षित जी ने अपनी रचनाओं में सम्वेदनाओं की अभिव्यक्ति के लिए शिल्प का उचित एवं कलात्मक प्रयोग किया है। अपने कथा साहित्य में मानव मन की सूक्ष्म सम्वेदनाओं को भी अभिव्यक्त किया है। उनकी अनुभूतियां इतनी सशक्त और सच्ची है कि वह अपने आप एक कलात्मक सौंदर्य के साथ अभिव्यक्त होती जाती है। दीक्षित जी की भाषा शैली पात्रानुकूल है।
मुंबई में आम बोलचाल की भाषा हिंदी है। दीक्षित जी की कहानी हो या उपन्यास सभी पात्रों की अपनी एक भाषा है, उस भाषा में अन्य भाषाएं मिलकर एक भाषा बनाती है, जिसे बंबइया कहते थे, अब वह मुंबईया हो गई है।
वस्तुतः दीक्षित जी एक संजीदा लेखक के साथ-साथ एक उम्दा और बेहतर इंसान थे। वे आम आदमी की पीड़ा से सहानुभूति रखते थे| यह उनकी कहानियों, उपन्यासों, उनकी फिल्मों से प्रमाणित होता है। दीक्षित जी आज हमारे बीच नहीं हैं किंतु उनकी रचनाएं आज भी उनके होने का एहसास कराती हैं। ऐसा लगता है कि दीक्षित जी की रचनाएं अपने समय को पार कर आज और भी प्रासंगिक हो गई है।
दीक्षित जी का जन्म 28 जून 1934 को मध्य प्रदेश राज्य के बालाघाट जिले में हुआ था| दीक्षित जी उन्नाव के रहने वाले थे| हिंदी से एम. ए. गोल्ड मेडलिस्ट थे| उन्हें उर्दू का अच्छा ज्ञान था। एम. ए. की पढ़ाई पूरी करने के बाद वे मुंबई की ओर रुख किए। दीक्षित जी का जीवन किसी कहानी से कम नहीं है। वे एक लोकप्रिय प्राध्यापक के रूप में जाने गए।
दीक्षित जी का लेखन, संभाषण, विचार-सक्रियता, रहन-सहन, व्यक्तित्व, मिलन सरिता, मित्र बनाने की कला, मितभाषिता आदि इन्हें अनायास ही आकर्षक बना देती थी। दीक्षित जी की तमाम रचनाएं चाहे फिल्म हो या अन्य साहित्य लेखन, विषय वस्तु एवं प्रस्तुति, कभी भी मध्यम वर्गीय निम्न मध्यम वर्गीय सीमाओं से बाहर नहीं निकल पाती है। उनके व्यक्तित्व को हम उनके कृतित्व में भी देख सकते हैं|
दीक्षित जी सेंट जेवियर कॉलेज में प्राध्यापक और विभागाध्यक्ष रहे। प्राध्यापिकी के साथ-साथ पत्रकारिता, लेखन, फिल्म लेखन, फिल्म अभिनय, मॉडलिंग के साथ-साथ नाटक में भी काम किया। दीक्षित जी ने अनेक फिल्मों में पटकथा लेखन तथा संवाद लेखन किया, जिसमें प्रमुख हैं- दीक्षा, सर, फिर तेरी कहानी याद आई, नाराज, नाजायज, जिस्म, कलयुग इत्यादि। दीक्षित जी का ‘स्वतंत्र जन’ समाचार पत्र में संपादकीय लेख छपता था। अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक वह अपना नियमित स्तंभ लेख लिखते रहें और उसे उस मुकाम तक पहुंचाया जो आज भी फल-फूल रहा है।  दीक्षित जी का निधन एक महीने कोमा में रहने के पश्चात 20 मई 2014 को जर्मनी के बर्लिन शहर में हुआ।
हिंदी साहित्य के वरिष्ठ साहित्यकार,चिंतक जगदंबा प्रसाद दीक्षित का नाम उन चंद लोगों में है जिन्होंने अपने लेखन को ही अपना पुरस्कार माना, अभिव्यक्ति को स्वर देकर ही संतुष्ट हो लिए जीवन की तमाम संत्रास, घुटन, अजनबीपन आदि को लेकर अभिव्यक्ति की जो आकांक्षा थी, उसे व्यक्त करने में ही अपनी सार्थकता समझी।
 
(सुशीला तिवारी ,जगदंबा प्रसाद दीक्षित पर एस.एन.डी.टी यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर रही हैं) 
 
 

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